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बाढ़ पीड़ितों की मदद का बीड़ा उठाया

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बाढ़ पीड़ितों की मदद का बीड़ा उठाया शिक्षित युवा वर्ग की बैठक में टीम का गठन किया गया जल्द ही बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए रवाना होंगे कार्यकर्ता बदायूं। शिक्षित युवा वर्ग ने बाढ़ पीड़ितों की मदद का बीड़ा उठाया है। तय किया गया कि खाने और रोजमर्रा की चीजों के पैकेट बनाकर बाढ़ग्रस्त इलाकों में बांटे जाएंगे। डाॅक्टरों की देखरेख में दवाओं का वितरण भी किया जाएगा।    घंटाघर स्थित कार्यालय पर बैठक की अध्यक्षता करते हुए संरक्षक अरशद रसूल ने कहा कि आपदा पीड़ितों की मदद करना हमारा फर्ज है। इसलिए हमें पहले अपने जिले में सहसवान के बाढ़ पीड़ितों की मदद को आगे आना चाहिए। नितिन गुप्ता ने कहा कि आटा, दाल, चावल, सब्जी, तेल, मसाले, चीनी-पत्ती, दवाई के साथ पन्नी आदि की व्यवस्था की जा रही है, ताकि बाढ़ पीड़ितों की मदद की जा सके। महासचिव शीराज अल्वी ने कहा कि संगठन पूरी पारदर्शिता और स्वच्छ भावना से काम कर रहा है। इसलिए किसी से भी नकद रुपये नहीं लिये जाएंगे। मदद करने के इच्छुक लोग सोमवार शाम तक सामान दे सकते हैं।    जिलाध्यक्ष सरफराज अब्बासी और सालिम रियाज के नेतृत्व में टीम का गठन किया गया। ...

शकेब जलाली, दुश्वारियों से जन्मा शायर

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शकेब जलाली, दुश्वारियों से जन्मा शायर 1934 में जन्मे शायर शकेब जलाली को यहां कम लोग ही जानते हैं। वह हिन्दुस्तान में पैदा हुए उर्दू शायर थे। उनका असली नाम सैयद हसन रिजवी था। उनके पूर्वज हिन्दुस्तान के अलीगढ़ के पास जलाली नाम के छोटे से कस्बे में रहते थे। महज 10 साल की उम्र में उनकी मां सड़क हादसे में चल बसी थीं। इसके बाद उनके पिता अपना दिमागी संतुलन खो बैठे और कुछ वक्त बाद वह भी चल बसे। जलाली ने मैट्रिक बदायूं से पास किया था। बाद में अपनी बहनों के साथ रावलपिंडी, पाकिस्तान में चले गए। पाकिस्तान पहुंचकर बी.ए. पास किया और शादी कर ली। इस दौरान तमाम दुश्वारियों का सामना करना पड़ा। रोजी-रोटी के लिए उन्होंने एक अखबार में नौकरी शुरू कर दी। जलाली ने कई साहित्यिक पत्रिकाओं में काम किया और फिर लाहौर चले गए। उन्होंने सादगी के साथ उर्दू शायरी की और नज़्म, रुबाई, कतआत में भी हाथ आजमाया। सन 1966 में किसी मनोरोग की वजह से रेलवे पटरी पर आत्महत्या की कर ली। दुश्ववारियों ने उंगली पकड़कर दुनिया को एक नए रंग में देखने वाली नजर बख्शी। शकेब ने इस नजर को गजलों की शक्ल दी...पेश है खिराजे अकीदत बतौर कुछ कलाम...

पाश की 5 कविताएं

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पाश की 5 कविताएं भगत सिंह को आदर्श मानने वाले अवतार सिंह पाश को भगत सिंह के ही शहादत के दिन 23 मार्च 1988 को खालिस्‍तानियों ने मार दिया था।  धार्मिक कट्टरपंथ और सरकारी आतंकवाद दोनों के साथ एक ही समय लड़ने वाले पाश का वही सपना था जो भगत सिंह का था। कविताओं के लिए ही पाश को 1970 में इंदिरा गांधी सरकार ने दो साल के लिए जेल में डाला था। यूँ तो उनकी हर कविता बार-बार पढ़ने लायक है, पर यहां 5 कविताएं दे रहे हैं...       1. सपने सपने हर किसी को नहीं आते बेजान बारूद के कणों में सोयी आग को सपने नहीं आते बदी के लिए उठी हुई हथेली पर आये पसीने को सपने नहीं आते शैल्फ़ों में पड़े इतिहास के ग्रन्थों को सपने नहीं आते सपनों के लिए लाजिमी है सहनशील दिलों का होना सपनों के लिए नींद की नज़र होनी लाजिमी है सपने इसीलिए सभी को नहीं आते ____________     2. सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-सोए पकड़े जाना – बुरा तो...

मैं आश्चर्य से भर जाता हूँः टैगोर

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मैं आश्चर्य से भर जाता हूँः टैगोर 7 मई को बांग्ला भाषा के महान कवि रवींद्र नाथ टैगोर की 157वीं जयंती है। इस मौके पर उन्हीं के एक लेख का हिन्दी अनुवाद पेश किया जा रहा है... आखिरकार मैं रूस में हूँ! मैं जिधर भी नजर दौड़ाता हूँ, आश्चर्य से भर जाता हूँ। किसी भी दूसरे देश में ऐसी स्थिति नहीं है...ऊपर से नीचे तक वे हर किसी को जगा रहे हैं...यह क्रान्ति लम्बे समय से रूस की दहलीज पर खड़ी अन्दर आने का इन्तजार कर रही थी। लम्बे समय से तैयारियाँ चल रही थींय इसके स्वागत के लिए रूस के अनगिनत ज्ञात और अज्ञात लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी और असहनीय यंत्रणाओं को भोगा।     क्रान्ति का ध्येय व्यापक है, परन्तु शुरुआत में यह दुनिया के कुछ निश्चित हिस्सों में घटित होती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे, पूरे शरीर के रक्त के संक्रमित होते हुए भी, कमजोर जगहों पर चमड़ी लाल हो जाती है और छाले फूट पड़ते हैं। यह रूस ही था, जहाँ की गरीब और बेसहारा जनता अमीरों और ताकतवर लोगों के हाथों इस कदर जुल्म सह रही थी जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिए, यह रूस ही है, जहाँ दो पक्षों के बीच की इस अत्यधिक गैर-बराबर...

मीडिया पर हावी होता बाज़ारवाद

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मीडिया पर हावी होता  बाज़ारवाद एक विषय पर अलग-अलग बातें करके मीडिया व्यापारी दो वर्गों को खुश करने में पूरी तरह कामयाब हो रहे हैं। हमें ऐसे दोगले चरित्र वाले मीडिया संस्थानों को बेनकाब कर सामाजिक बहिष्कार करना ही होगा। हिन्दुस्तानी मीडिया हमेशा से पीडि़त, वंचित, शोषित, उपेक्षित वर्ग की आवाज उठाता रहा है। मीडिया की ईमानदारी और मिशन मोड में काम करने के अंदाज ने हमेशा सभी को अपनी तरफ आकर्षित किया है। मीडिया के लिए आम आदमी के मन में सम्मान और आकर्षण की भावना रही है। शायद इसी वजह से भारतीय लोकतंत्र में प्रेस/मीडिया को चौथे स्तंभ का दर्जा दिया गया है। मीडिया ने भी हर दौर में एक सजग प्रहरी के रूप में अपने कर्तव्य का पालन किया है। समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार से मीडिया पर्दा उठाता रहा है।    आज भी मीडिया के हस्तक्षेप से तमाम लोगों को न्याय मिलता है। अपना धर्म निभाने में न जाने कितने ही मीडिया कर्मियों ने परेशानियों का सामना किया। यहां तक कि मौत का सामना भी करना पड़ा, फिर भी उन्होंने कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ा। सलाम है ऐसे कर्तव्य परायण मीडिया कर्मियों के जज्बे को। ...

सबका साथ, सबका विकास

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सबका साथ, सबका विकास भाजपा सबका साथ, सबका विकास कर रही है। अब देखो, तय अवधि रोजगार की अधिसूचना चुपके से सभी सेक्टर में जारी और लागू कर दी। मौजूदा और आने वाली पीढ़ी को ठेकेदारी प्रथा में धकेलने का काम है। रखो या निकालो, कोई आवाज नहीं उठा सकता। इस तरह निजीकरण हर सेक्टर में फलेगा-फूलेगा। साथ ही आरक्षण की व्यवस्था भी समाप्त।     इससे जो सवर्ण खुश हो सकते हैं, उनके लिए भी ये खबर है कि महाराज आपके बच्चे भी कोई पक्की नौकरी नहीं पाएंगे। जहां-तहां कभी चार महीने की तो कभी तीन महीने की नौकरी मिलेगी। कितने की मिलेगी, क्या सुविधा मिलेगी, ये पूछना भी मत। ऐसा इसलिए कि जिनकी पक्की नौकरी है वे ही पैदल हो रहे हैं।    मार्च 18 की समाप्ति पर बरेली में बिजली विभाग के चीफ इंजीनियर तक को प्रदर्शन में आना पड़ा क्योंकि योगी सरकार इस विभाग को निजी हाथों में सौंपने जा रही है। ये भी जान लीजिए कि इसका समर्थन किसने किया। जवाब है-भारतीय मजदूर संघ ने। ये विंग आरएसएस की है।     15 फरवरी को हुई मीटिंग में बीएमएस ने समर्थन दिया। श्रमिकों में भ्रम पैदा करने को अब इसका ख...

विकास: कल्पनाओं के संसार में

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विकास: कल्पनाओं के संसार में स्मार्ट सिटी : जैसे ही घर से बहार निकला सड़क अपने आप चल पड़ी, फिर मैंने जैसे ही चिंगम फेंकी डस्टबिन अपने आप आगे आ गया..पार्क में गाय डाईपर बाँध के घूम घूम रही थी। सबकुछ एक सपना सा लग रहा था अचानक सड़क धड़धड़ाने लगी देखा तो बापू ने लात मार के खाट पे से नीचे गिरा दिया! सांसद का गोद लिया गाँव : सड़क चलते चलते किसी गाँव में पहुँची तो क्या देखता हूँ रोबोट खेत जोत 5रहे थे किसान खेत के बीच में बने AC ऑफिस में बैठे कॉफ़ी की चुस्की लेते रोबोट को कंट्रोल कर रहे थे..सबके घर एयरकंडिशन महल बन चुके थे, सड़क के एक तरफ दूध का तालाब तो दूसरी तरफ मक्खन के टीले! 2 करोड़ जॉब्स/साल : आजकल मेरे जैसे कामचोर नौजवान छुपते घूम रहे हैं क्योंकि सरकार पकड़ पकड़ कर सरकारी नौकरियों पे भर्ती कर रही है..एक बार काला कम्बल मेरे पे डाल के ले गए और तहसीलदार भर्ती करने लगे, मुश्किल से जान बचा के भागा फिर सरकार ने बेरोजगार विदेशों से आयात करने शुरू किये। 1 सिर = 10 सिर : बेरोजगारों की तरह सुबह 11 बजे उठा नजर अख़बार पे पड़ी हैडिंग देखते ही सीना 112 इंच का हो गया मुझे अपनी आँखो...