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लुटेरी साबित हो सकती है मीठी आवाज़

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लुटेरी साबित हो सकती है मीठी आवाज़ Share for Care... कल शाम एक लड़की का फोन आया था। बोली-सर, मैं जॉब के लिए एप्लाई कर रही थी। गलती से आपका नम्बर डाल दिया है। क्योकि मेरे और आपके मोबाइल नंबर में मामूली सा फर्क है। आपके पास थोड़ी देर में एक ओटीपी आएगा... प्लीज बता दीजिए सर, मेरी जिन्दगी का सवाल है। बात बिल्कुल जेनुइन लग रही थी, मैनें इनबॉक्स चेक किया, दो मैसेज आये थे। एक पर ओटीपी था, दूसरा एक मोबाइल से आया मैसेज। लिखा था, डियर सर, आपके पास जो ओटीपी आया है, प्लीज इस नंबर पर भेज दीजिये। thanks a lot in advance… मैसेज देख ही रहा था कि फोन दोबारा आया। वही सुमधुर आवाज। बस नंबर दूसरा था। सर, आपने देखा होगा अब तक ओटीपी आ गया होगा या तो बता दो या फारवर्ड कर दो उस नंबर पर, सर प्लीज... मैंने कहा कि बता दूंगा, पर आप पहले एक काम करो... हां सर बोलिए... जो नंबर आपने डाला है, वह मेरे नम्बर से मिलता-जुलता है, तभी आपसे यह गलती हुई है न ? हां सर... उसके लहजे में उतावलापन साफ महसूस हो रहा था। मैंने कहा- ओके, आप उसी नम्बर से मुझे कॉल करो, ताकि मैं वेरीफाई कर सकूं की आप सही हो। वो क्या है न सर,...

देश का अपमान है इटली में शादी...

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देश का अपमान है इटली में शादी... क्या भारत माँ का आँचल इतना छोटा हो गया है कि इस देश की 220 करोड़ की सम्पत्ति की मालकिन बेटी अनुष्का शर्मा और 390 करोड़ की सम्पत्ति के मालिक बेटे विराट कोहली को इटली में जाके शादी रचानी पड़ी ? माना आप स्वतंत्र है लेकिन आप एक वैश्विक स्तर की हस्ती भी है। अगर आप ऐसा करते है तो मेरे विचार से और एक भारतीय होने के नाते जहां आपने 220 करोड़ इस धरती से कमाए है, इस धरती पर उगे हुए अन्न को खाकर आपने अपनी भूख मिटाई और आज अपनी जिंदगी के सबसे बेहतर पल मनाने इटली चले गए। कुछ कथित बुद्धजीवियों की नजर में यह कोई बड़ी बात नही है लेकिन इसके लिए दोनो की जितनी निंदा की जाए कम ध्।

जूते की अभिलाषा

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जूते की अभिलाषा चाह नही मैं विश्वसुंदरी के, पग में पहना जाऊँ। चाह नही दूल्हे के पग में रह, साली को ललचाऊँ। चाह नहीं धनिकों के चरणों में, हे हरि! डाला जाऊँ। ए.सी. में कालीन पे घूमूं, और भाग्य पर इठलाऊं। बस निकालकर मुझे पैर से उस मुंह पर तुम देना फेंक। जिस मुँह से भी निकले देशद्रोह का शब्द भी एक।

बेजमीरों के अज़्म पुख़्ता हैं...

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बेजमीरों के अज़्म पुख़्ता हैं... रूबरू जब कोई हुआ ही नहीं ताक़े दिल पर दिया जला ही नहीं ज़ुल्मतें यूं न मिट सकीं अब तक कोई बस्ती में घर जला ही नहीं बेजमीरों के अज़्म पुख़्ता हैं ज़र्फ़दारों में हौसला ही नहीं नक़्श चेहरे के पढ़ लिये उसने दिल की तहरीर को पढ़ा ही नहीं उम्र भर वह रहा तसव्वुर में दिल की ज़ीनत मगर बना ही नहीं हमने अश्कों पर कर लिया क़ाबू ग़म का तूफ़ान जब रुका ही नहीं वह अंधेरे का दर्द क्या जाने ? जिसका ज़ुल्मत से वास्ता ही नहीं

गाय को आश्रय सबकी जिम्मेदारी

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गाय को आश्रय सबकी जि़म्मेदारी गाय की रक्षा के मुद्दे पर आए दिन अराजकता फैल रही है। समाज के कुछ कथित गौ सेवकों को गाय की रक्षा का काम मिल गया है। यह बात दीगर है कि उनकी नजर उन गायों पर नहीं जाती है जो रोजाना पालीथीन खाकर दम तोड़ती हैं। हजारों गायों को आश्रय तक उपलब्ध नहीं है, रोजाना सड़कों पर विचरण करना ही उनके भाग्य में लिखा है। गाय की रक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। भारतीय समाज में इसको यूं ही नहीं उच्च स्थान मिला है। बेशक समाज के लिए गाय एक उपयोगी पशु है। मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहना जरूरी हो गया है कि गाय पर सियासत बंद होनी चाहिए। सियासी और मजहबी चश्मे को उतारकर मौजूदा दौर में जरूरत इस बात की है कि हर हाल में गाय की रक्षा होनी ही चाहिए। हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि इस्लाम में भी गाय के महत्व का बखान किया गया है। कुरआन में तो गाय और उसके दूध खूब तारीफ की गई है। इस्लामिक ऐतबार से भी गाय की हिफाजत बहुत जरूरी है।     गाय पर राजनीति से बेहतर है कि सरकार एक सुझाव पर अमल कर ले। वह यह कि सरकार की तरफ से यह ऐलान कर दिया जाए कि कि कल से गाय क...

...भेष बनाए हुए हैं लोग

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...भेष बनाए हुए हैं लोग कुछ इस तरह का भेष बनाए हुए हैं लोग, जैसे कि देव लोक से आए हुए हैं लोग। आवाजें सुन न पाए समय, वर्तमान की, प्राचीनता का शोर मचाए हुए हैं लोग। हैं नहीं वो खुद को दिखाने की फिक्र में, चेहरे पर इश्तहार लगाए हुए हैं लोग। बेकारी, बीमारी , अशिक्षा की आग से, कुर्सी तो अपनी अपनी बचाए हुए हैं लोग। अब कुछ ही छायादार पेड़ और बचे हैं, उन पे भी गिद्ध दृष्टि जमाए हुए हैं लोग। रहने न देते दीप, तेल , बाती आसपास, कुछ रौशनी से खौफ सा खाए हुए हैं लोग। गाता है कौन , गाता नहीं, बन्दे मातरम कितना अहम सवाल उठाए हुए लोग। - - - - - - - - - - - काले को सफेद बना देते हैं लोग, झूठ को सच बना देते हैं लोग। तिल तिल पिसता गरीब देश का, गाय, गोबर में उलझा देते हैं लोग। -----अज्ञात-----

'बुलेट' का लेट होना ही बेहतर...!

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'बुलेट' का लेट होना ही बेहतर...! खतौली/ मुजफ्फरनगर भीषण रेल हादसे के बाद तो यही तमन्ना की सकती है कि हिन्दुस्तान में बुलेट का लेट होना ही बेहतर है। वैसे तो देश में बुलेट चलाने का फैसला अच्छा बात है। विकास के लिहाज से यह दूरगामी सोच है। फिलहाल खतौली रेल हादसे से हमें सबक लेना जरूरी हो गया है। पहला सबक, यह कि बुलेट से पहले उन रेलवे ट्रक को दुरुस्त करने पर ध्यान दिया जाए, जो ब्रिटिश साम्राज्य से हमें सौगात में मिले थे। दूसरा सबक, यह कि बुनियादी समस्याओं और जरूरतों को नजरअंदाज करके बड़े झूठ न बोले जाएं। आखिर लफ्फाजी के दम पर टिके रहने की भी कोई मियाद होती है, कोरी बयानबाजी से जनता को कब तक बेवकूफ बनाया जा सकेगा ? हादसे के बाद मौतों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। सोचिए, जरा बुलेट ट्रेन के साथ ऐसा हादसा होता तो...? ऐसा खयाल करने भर से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।      खराब ट्रैक के मामले में कोई भी अपनी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। अच्छे कारनामों और उपलब्धियों का श्रेय जब लपक कर हासिल किया जाता है तो नैतिकता के नाते इस हादसे की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। अब अपने बचाव क...