पवित्र प्यार का अनमोल बंधन रक्षाबंधन सिर्फ़ एक त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के अटूट रिश्ते की बुनियाद है। प्यार, विश्वास और रक्षा के संकल्प से बुना एक पवित्र बंधन। यह दिन महज़ राखी बांधने का नहीं, बल्कि उन अनगिनत यादों, हंसी-ठिठोली, नोकझोंक और अपनत्व के एहसास को फिर से जीने का है, जो बचपन से लेकर आज तक इस रिश्ते की नींव को मज़बूती देते हैं। इस दिन हर बहन की आंखों में भाई को देखने की चमक के साथ बचपन की तस्वीरें उभरने लगती हैं। वो चॉकलेट के लिए हुई मासूम लड़ाइयाँ, खिलौनों को लेकर नोंक-झोंक और फिर बिना कहे ही गलती माफ़ कर देने का अपना अलग अंदाज़। रक्षाबंधन उन बीते पलों को फिर से जीने का सबसे प्यारा जरिया बन जाता है। शादी के बाद चाहे बहन दूर चली जाए, लेकिन रक्षाबंधन की अनोखी सुबह उसे अपने मायके की दहलीज की तरफ खींच ही लाती है। वो दहलीज, जहां उसकी हंसी के साथ भाई की शरारतें और मां की ममता आज भी महकती हैं। एक बहन के लिए भाई का घर सिर्फ़ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं का मंदिर होता है। इस रिश्ते की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यह संपत्ति और भौतिकता से परे दिल की गहराइयों से जुड़ा...
कब तक सहमे रहोगे ललकारों से? अरशद रसूल यह हरगिज़ न कहो कि मर गया कोई देश का हक़ था अदा कर गया कोई बिटिया के पीले हाथ कौन करेगा शहनाइयों का काम अब मौन करेगा दायित्वों का निर्वहन कौन करेगा जान पर खेलकर गुजर गया कोई यह हरगिज़ न कहो कि मर गया कोई देश का हक़ था अदा कर गया कोई अंधेरा कितना कर दिया इक फायर ने बुढ़ापे की लाठी छीनी उस कायर ने मरा नहीं, अमरत्व पाया है इक नाहर ने देश का कर्ज यूं अदा कर गया कोई यह हरगिज़ न कहो कि मर गया कोई देश का हक़ था अदा कर गया कोई करुण क्रंदन बनी घर की किलकारी कोई दहाड़े, कोई चूड़ी तोड़े बेचारी पापा अब न आएंगे चीखे राज दुलारी ज़िंदगी के कर्ज अदा कर गया कोई यह हरगिज़ न कहो कि मर गया कोई देश का हक़ था अदा कर गया कोई बिंदिया-चूनर रोएंगे और सिंदूर रोएगा हर खुशी रोएगी, हर शुभ दस्तूर रोएगा बूढ़ी आंखें चुप हैं, दिल भरपूर रोएगा हर आंख को आंसुओं से भर गया कोई यह हरगिज़ न कहो कि मर गया कोई देश का हक़ था अदा कर गया कोई दुश्मन का दुस्साहस कितना तगड़ा है कितनी ही मांगों का सिंदूर उजड़ा है मातम ही मातम हर ओर उमड़ा है य...
हमदे पाक मुक़द्दर जब मिरी आंखों में आंसू भेज देता है, मिरा मौला मिरी कश्ती लबे जू भेज देता है। सजा देता है फिक्रो फन की राहों को मिरा मौला, क़लमकारों की तहरीरों में जादू भेज देता है। इरादा जब भी करता हूं मैं हम्दे पाक लिखने का, कलम में और लफजों में वह खुष्बू भेज देता है। अंधेरों के मनाजि़र जब मिरी हस्ती में आते हैं, मकाने दिल में रहमत के वह जुगनू भेज देता है। मुझे अपनी खताओं पर नदामत जब भी होती है, पषेमानी के आंखों में वह आंसू भेज देता है। जहां पर कुक्रो जुल्मत के बना करते हैं मनसूबे, खुदा तनवीर वहदत की उसी सू भेज देता है। हमारी जिंदगानी की मिटा देता है तारीकी, अंधेरी रहगुजारों में वह जुगनू भेज देता है।
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